Poetry 1 min read 164.7K reads

पदचिन्ह


अनगिनत कदमों के निशांपीछे छूटते रहेमंजिल की तलाश मेंकाफिले गुज़रते रहे

पुराने पदचिन्हों परनित नए निशां बनते रहेकितने मंज़िल पे पहुँचेना जाने कितने नाकाम रहे।

मं शर्मा (रज़ा)

Read more Earn more Learn more