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नितांत


चौंधियाते जीवन मेंनितांत अंधेरा थाउसके और मेरे बीचजन्मों का फेरा था

रोज़ रोज़ गुज़रा मैंउसकी गली से थायाचकों से घिरा बैठामुझको न टेरा था

मुझमें गुमान भीउससे नहीं थोड़ा थादेखा किया रोज़ रोज़उसके दर पे न चढ़ा था।

मं शर्मा(रज़ा)

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