Poetry 1 min read 466.9K reads

निर्जीव


धधकती वायु बही धरा परझुलस गए सब पेड़ सुलग कररवि का प्रकोप सहा न जाएवसुधा बेचारी हुई असहाय

ये कैसी हवा चली है निष्ठुरछिप गए सब घरों में जाकरडरे सहमे से प्राणी भयातुरसिमटे पड़े निर्जीव से होकर।

मं शर्मा (रज़ा)

Read more Earn more Learn more