धधकती वायु बही धरा परझुलस गए सब पेड़ सुलग कररवि का प्रकोप सहा न जाएवसुधा बेचारी हुई असहायये कैसी हवा चली है निष्ठुरछिप गए सब घरों में जाकरडरे सहमे से प्राणी भयातुरसिमटे पड़े निर्जीव से होकर।मं शर्मा (रज़ा)
धधकती वायु बही धरा परझुलस गए सब पेड़ सुलग कररवि का प्रकोप सहा न जाएवसुधा बेचारी हुई असहाय
ये कैसी हवा चली है निष्ठुरछिप गए सब घरों में जाकरडरे सहमे से प्राणी भयातुरसिमटे पड़े निर्जीव से होकर।
मं शर्मा (रज़ा)