न रूप है न आकार हैन घर कोई न द्वार हैमैं एक आवारा भादलभटकना मेरा स्वभाव हैगरज गरज के गुजरा कभीबिजली बन के कड़क गयावाष्प बन कर जीवन कीधरती पर ही बरस गया ।मं शर्मा (रज़ा)
न रूप है न आकार हैन घर कोई न द्वार हैमैं एक आवारा भादलभटकना मेरा स्वभाव है
गरज गरज के गुजरा कभीबिजली बन के कड़क गयावाष्प बन कर जीवन कीधरती पर ही बरस गया ।
मं शर्मा (रज़ा)