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नाराज़गी

फासले कुछ बढ़ रहे हैं

अजीज़ नाराज़ हो रहे हैं

कुछ साथी अंग संग मेरे

खंजर लिए चल रहे हैं


कुछ अपने उठ गए हैं

कुछ अपनों से रूठ गए हैं

मैं हो रहा हूँ तन्हा

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