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नारायण


अहसासों को सुन सकते होधड़कनों को बुन सकते होसमय के पार जा सकते होकल को दोहरा सकते हो

जीवन के जीवंत प्रांगण मेंमौत को दस्तक दे सकते होजीव हो मर्यादा को समझोनर हो नारायण नहीं हो सकते हो।

मं शर्मा (रज़ा)

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