चाँद पर मुग्ध हैसदियों से प्रकृतिएक तुम ही नहींरखती हो आसक्तितुम तो धरा होतनिक धीरज धरोसब में बँटना ही हैचाँद की नियति।मं शर्मा (रज़ा)
चाँद पर मुग्ध है
सदियों से प्रकृति
एक तुम ही नहीं
रखती हो आसक्ति
तुम तो धरा हो
तनिक धीरज धरो
सब में बँटना ही है
चाँद की नियति।
मं शर्मा (रज़ा)