पंखों का मोहताज नहीं वो

हौसलों से मजबूर है

हार चुका हिम्मत की बाज़ी

नाकामियों से चूर है


आशाओं ने निराश किया है

जी भर उसे आजमाने को

अब और नहीं शेष कुछ भी

उसके पास गंवाने को ।


मं शर्मा( रज़ा)