बिखर रही है बुनियादेंतिरक रही है दीवारेंपिघल रहे अहसासों कोबिछड़ रहे हमराहों कोकह दो कोई ये जाकरक्या करोगे अब आकरखत्म हो चुकीं सब मियादेंलौट रही हैं फरियादें ।मं शर्मा( रज़ा)
बिखर रही है बुनियादेंतिरक रही है दीवारें
पिघल रहे अहसासों कोबिछड़ रहे हमराहों को
कह दो कोई ये जाकरक्या करोगे अब आकर
खत्म हो चुकीं सब मियादेंलौट रही हैं फरियादें ।
मं शर्मा( रज़ा)