Poetry 1 min read 77K reads

मेरे भीतर


क्या है जो मिट रहा हैमेरे भीतर घट रहा हैजीने को शेष बचा नहींफिर भी जीवन चल रहा है

कल भी एक सुबह थीआज फिर एक सुबह हैआगे की व्यथा रची नहीं हैवक्त खुद को दोहरा रहा है।मं शर्मा (रज़ा)

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