बिखरी बिखरी शामों कीउजड़ी उजड़ी रातें हैंतपती परती धरती कीपाँव झुलसाती राहें हैंनिर्वस्त्र खड़े सूने पेड़ों कीधधकती सी आहें हैंमेह बरसने की आशा मेंगगन पर टिकी निगाहें हैं।मं शर्मा (रज़ा)
बिखरी बिखरी शामों कीउजड़ी उजड़ी रातें हैंतपती परती धरती कीपाँव झुलसाती राहें हैं
निर्वस्त्र खड़े सूने पेड़ों कीधधकती सी आहें हैंमेह बरसने की आशा मेंगगन पर टिकी निगाहें हैं।
मं शर्मा (रज़ा)