Poetry 1 min read 176.5K reads

मंजरी


पात सभी झड़ गएकदमों तले कुचल गएसमय के कुचक्र सेसभी पतझड़ हो गए

दूर किसी दरख्त परकाल वश निर्वस्त्र परसूनी उजड़ी राह परदृग अपने गाड़ कर

एक सुवासित मंजरीसिकुड़ी सहमी बावरीबहार के पुनरागमन कीबाट जोहती रही।

मंजू शर्मा (रज़ा)

Read more Earn more Learn more