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मालामाल


झुक आईं हैं शाखेंअपने पत्तों के बोझ सेदरख्त को गुमान हैशाखों के इंकिसार पे

होवो मालामाल गरतो भी गुमां न होनज़र आसमाँ पे सहीपाँव ज़मीं पर हो ।

मं शर्मा (रज़ा)

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