इतने विशाल आसमान में

तन्हा घूमा करता है

रोज़ आता रोज़ जाता

रोज़ घटता बढ़ता रहता है


हर खिड़की हर मुंडेर पे

ताका झांकी करता है

थोड़ा थोड़ा सब में बंट कर

सबका प्रिय तू बनता है


बंजारों सा फिरते रहना

मुझको तनिक न भाता है

कभी किसी का न होकर रहना

तुझमें मुझमें फर्क करता है।



मं शर्मा (रज़ा)