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कोपलें


लहरें मचल उठीं दरिया मेंबादलों ने ली अंगड़ाई हैकोपलें फूट पड़ी शाखों पेबह निकली पुरवाई है

हरषित हैं ग्वाल बाल सबबगिया में छाई अमराई हैघर आँगन सब लगे सजानेसुध कान्हा को हमारी आई है।

मं शर्मा( रज़ा)

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