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कोहराम


आँखों में हैं आँसू परअधरों पर मुस्कान बहुत हैदिल में थोड़ी जगह नहीं पररहने को मकान बहुत है

विचारों के स्वच्छंद पटल परअवरोधों का विराम बहुत हैजीवन की इस धूप छाँव मेंसुनने को कोहराम बहुत है ।

मं शर्मा (रज़ा)

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