बेपनाह हसरतों की हद न कोई
सबको सब कुछ पाने की ललक है
हुआ करे आसमां अपार अनंत ही
मन की परवाज़ का न कोई अंत है
भूल रहा आदमियत को आदमी
हुआ आदमी से बड़ा आदमी का कद है
बदल रहा हर चीज़ की तासीर को
खुद को खुदा समझने की कवायद है ।
मं शर्मा (रज़ा)

बेपनाह हसरतों की हद न कोई
सबको सब कुछ पाने की ललक है
हुआ करे आसमां अपार अनंत ही
मन की परवाज़ का न कोई अंत है
भूल रहा आदमियत को आदमी
हुआ आदमी से बड़ा आदमी का कद है
बदल रहा हर चीज़ की तासीर को
खुद को खुदा समझने की कवायद है ।
मं शर्मा (रज़ा)