शहर शहर यूँ ही घुमता रहा हूँ

अंदाज़ मुसाफिराना रहा है मेरा

मैं दर दर भटकता फिर रहा हूँ

अंदाज सूफियाना हो गया है मेरा


गली से उसकी गुज़रा हूँ जबसे

एक ही राह नज़र आती है तबसे

लोग काफिर अब तो कहने लगे हैं

अंदाज काफिराना हो चला है मेरा।



मं शर्मा (रज़ा)