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कंपन


बोझ सॄष्टि का उठाती हूँधीर हूँ इसलिए धरती हूँभीतर क्रोध का कंपन हैऊपर से शांत दिखाती हूँ

धधकते लावे की जलन कोभीतर घात करती अगन कोनदी की शीतल सिहरन सेघावों का मरहम बनाती हूँ।

मं शर्मा (रज़ा)

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