मुश्किलें कितनी भी आएंहौसले चाहे पस्त हो जाएंअंधेरा कितना भी गहराएआस की ज्योति न बुझने पाए।मं शर्मा( रज़ा)
मुश्किलें कितनी भी आएंहौसले चाहे पस्त हो जाएंअंधेरा कितना भी गहराएआस की ज्योति न बुझने पाए।
मं शर्मा( रज़ा)