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जज़्बात


जज्ब कर दर्द को सीने मेंखुशियों के नज़्म कहता हूँरात कहो तुम अंधियारी मैंसुबह की परछाईं कहता हूँ

तुमको छूनी होंगी ऊँचाईयाँमैं ज़मीन से जुड़ा रहता हूँदर्द मुझे अब दर्द नहीं देतेउन्हें खुशियों से सींचा करता हूँ।

मं शर्मा (रज़ा)

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