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इशारों में


मन के भाव बहुत गहरे थेइशारों में समझाए न गएलफ्ज़ों में कहना मुश्किल थाअनकहे अनसुने रह गए

भाव यूँही पिघल पिघल करवक्त के धारों में बह गएयादों के वृहद जखीरों कीतलहटी में काई बनके रह गए।

मं शर्मा (रज़ा)

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