कहीं रख के भूला हूँ कुँजी उस ताले की

हिफाजत में जिसकी जीवन रख छोड़ा है

रफ्ता रफ्ता जीना भी अब भूलने लगा हूँ

एक ताले ने चेतना को जड़ करके छोड़ा है।



मं शर्मा रज़ा)