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हिमाकत


तुम ही कहते थेकभी तो मिला करोआज मिलने का मन हुआहिमाकत बता दी

कितने उलझ गए हैंअपनों से ये रिश्तेसीधे रास्तों पर किसनेदीवारें चुनवा दीं।

मं शर्मा (रज़ा)#स्वरचित

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