हरी भरी वसुंधरा परधवल चादर बिछ आई हैलहराते खेत खलिहानों परकिसने हिम की आफत ढाई हैझरने जम गए हिम बनकरचहुँओर हिम-वर्षा छाई हैसूरज को निगल गया कौनकिसने जीवन पे रोक लगाई है।मं शर्मा (रज़ा)
हरी भरी वसुंधरा परधवल चादर बिछ आई हैलहराते खेत खलिहानों परकिसने हिम की आफत ढाई है
झरने जम गए हिम बनकरचहुँओर हिम-वर्षा छाई हैसूरज को निगल गया कौनकिसने जीवन पे रोक लगाई है।
मं शर्मा (रज़ा)