कुछ तुम कहो

कुछ मैं भी कहूँ

चलो एक दूजे को

सुने सुनाएँ


एकल राहों पर

बहुत चल चुके

अब मंजिलों के

हमराह हो जाएँ।


मं शर्मा( रज़ा)