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हलाहल


यादों के जख्म हैंमरहम से नहीं भरतेहलाहल बन करआँखों से रिसते हैं

शिव नहीं हूँकंठ में धारण कर लूँयादों का हलाहल हैउम्र भर रिसेगा।

मं शर्मा (रज़ा)

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