किसी का नहीं
पर सबका है
कुछ ऐसा तू
मन बसिया है
घनश्याम है
तन का काला
छलिया है तू
रंग रसिया है
दिल अकुलाए
रूठो जो तुम
कैसे मानोगी
कह भी दो तुम
जग जाने है
तू ही न माने
बिन राधा के
श्याम अधूरा है।
मं शर्मा (रज़ा)

किसी का नहीं
पर सबका है
कुछ ऐसा तू
मन बसिया है
घनश्याम है
तन का काला
छलिया है तू
रंग रसिया है
दिल अकुलाए
रूठो जो तुम
कैसे मानोगी
कह भी दो तुम
जग जाने है
तू ही न माने
बिन राधा के
श्याम अधूरा है।
मं शर्मा (रज़ा)