Poetry 1 min read 243K reads

घनघोर घटा


बढ़ते अंधेरेघनघोर घटाएँलौटे मुसाफिर कादिल दहलाएँ

दूर देस सेपरदेसी घर आएभय के मारेराह न सुझाए

आँख मीच सुनमन क्या सुझाएधीरज धरछंट जाएंगे साए।

मं शर्मा (रज़ा)

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