बढ़ते अंधेरेघनघोर घटाएँलौटे मुसाफिर कादिल दहलाएँदूर देस सेपरदेसी घर आएभय के मारेराह न सुझाएआँख मीच सुनमन क्या सुझाएधीरज धरछंट जाएंगे साए।मं शर्मा (रज़ा)
बढ़ते अंधेरेघनघोर घटाएँलौटे मुसाफिर कादिल दहलाएँ
दूर देस सेपरदेसी घर आएभय के मारेराह न सुझाए
आँख मीच सुनमन क्या सुझाएधीरज धरछंट जाएंगे साए।
मं शर्मा (रज़ा)