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गर जानता


गर जानता टूट कर बिखर जाऊँगानिशाने पर खुद को रखा न होतादिल शीशे का है अगर जान पातेकिसी पत्थर से दिल लगाया न होताखरीद लाते दर्द बाज़ार से खुद हीदिल के भीतर बसाया न होता ।

मं शर्मा (रज़ा)

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