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गागर


गागर में सागर होने कामन में भ्रम पालूँ कैसेपतझड़ ठहरा जीवन मेंबहार का मौसम बताऊँ कैसे

अहसासों से खाली गागर मेंभावों का अमृत लाऊँ कैसेदिलों के बीच पड़ी दीवारों कोझूठे दावों से झुठलाऊँ कैसे ।

मं शर्मा( रज़ा)

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