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दुर्गति


अपने अपने ग़मअपनी तन्हाई हैवक्त के मारों नेदुर्गति पाई है

सूखे हुए दरख्त मेंकली मुस्कुराई हैजीवन की आस मेंसाँस लौट आई है।

मं शर्मा (रज़ा)

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