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ढलती साँझ


दिन गुज़रा इंतज़ार मेंसाँझ भी ढल गईएक अदद चाँद कोजिंदगी तरस गई

कह के गया था वोसाँझ ढले आने कीदिल नाकाम तो हुआआस फिर भी रह गई।

मं शर्मा (रज़ा)

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