बंद दरवाजा हूँ मेरी किस्मत न पूछ
कब से ड्यौढ़ी पर मुस्तैद खड़ा हूँ
कोई आया न आएगा जानता हूँ
एक दस्तक की आस में अड़ा हूँ
हर दर के नसीब में दस्तक नहीं है
हर आस पूरी हो जरूरी नहीं है
चले जा रहे हैं सब दूसरे दरों पर
मानो मेरा यहाँ कोई वजूद नहीं है ।
मं शर्मा (रज़ा)

