Poetry 1 min read 578.2K reads

दरबार


सारी उम्र राह निहारीतू आया नहीं घरद्वार मेंआँखें बिछाए बाँह फैलाएमैं तत्पर रहा सत्कार में

घूम घूम कर तुझको ढूँढाइस पूरी कायनात मेंमैं ही शायद खो गया थातू बैठा था अपने दरबार में।

मं शर्मा (रज़ा)

Read more Earn more Learn more