सारी उम्र राह निहारीतू आया नहीं घरद्वार मेंआँखें बिछाए बाँह फैलाएमैं तत्पर रहा सत्कार मेंघूम घूम कर तुझको ढूँढाइस पूरी कायनात मेंमैं ही शायद खो गया थातू बैठा था अपने दरबार में।मं शर्मा (रज़ा)
सारी उम्र राह निहारीतू आया नहीं घरद्वार मेंआँखें बिछाए बाँह फैलाएमैं तत्पर रहा सत्कार में
घूम घूम कर तुझको ढूँढाइस पूरी कायनात मेंमैं ही शायद खो गया थातू बैठा था अपने दरबार में।
मं शर्मा (रज़ा)