प्रियजन के अनिष्ट का
धन ,सत्ता के जाने का
भय दिखा बता कर
आशंकित कर जाएगा
डर का अपना अस्तित्व नहीं
तेरी दुर्बलता से उपजेगा
डर से डरना छोड़ बंदे
नहीं तो रोज़ डराएगा
डर एक मनोस्थति है
भयभीत मन की विकृति है
निर्भीक हो ठान मन में
जो होना है हो जाएगा।
मं शर्मा (रज़ा)
