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दंड


तेरी नज़र में जो कर्म थाउसकी नज़र में गुनाह हैहर कुकर्म के गुनाह कायहाँ एक सुनिश्चित दंड है

जीवन में कुछ निरपेक्ष नहींहर प्रक्रिया यहाँ सापेक्ष हैकर्मों का निर्धारण कौन करेसबको जीवन का हक है।

मं शर्मा( रज़ा)

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