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चीत्कार


ये कैसी नादानी तेरीये कैसा प्रतिकार हैमत कर उत्पात प्राणीचार दिन का दरबार है

ह्रदय को शांत करव्यर्थ ये चीत्कार हैतेरी व्यथा कौन सुनेगाबाहर भी हाहाकार है ।

मं शर्मा(रज़ा)

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