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छोर


समय के अंतिम छोर परथकी हुई जो नाव खड़ी हैजीवन के भँवर से लड़ करकितनी बार बाहर निकली है

शिथिलता का अंत निश्चित हैसमय धारा बहती रहती हैनई नावों का संघर्ष देखनेयुग मूकदर्शक बना रहता है ।

मं शर्मा (रज़ा)

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