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छाँव


धूप में छाँव मेंपथभ्रष्ट राहों मेंढूँढता हूँ घर मेराहर उजड़ते गाँव में

डगमगाते पाँवों केरिसते हुए छालों मेंजीवन सिमट रहा हैदर्द की बाहों में ।

मं शर्मा (रज़ा)#स्वरचित

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