Poetry 1 min read 581.5K reads

चली आओ


चली आओ मेरे कदमों केनिशां खोजते खोजतेछोड़ देना न साथ मेराहौसलों से हारते हारते

इस अंधेरे के बाद भोर हैढल जानी है रात ढलते ढलतेजहां और भी हैं जहान मेंपा लेंगे यूँही चलते चलते ।

मं शर्मा (रज़ा)

Read more Earn more Learn more