मन में उमड़ते भाव समेटेबार बार किनारों कोछूकर चंचल लहरेंयूँ लौट रही हैंमानो प्रेमी से मिलने कोव्याकुल प्रेयसीहर बार बिछोह कादंश झेल रही है।मं शर्मा (रज़ा)
मन में उमड़ते भाव समेटेबार बार किनारों कोछूकर चंचल लहरेंयूँ लौट रही हैं
मानो प्रेमी से मिलने कोव्याकुल प्रेयसीहर बार बिछोह कादंश झेल रही है।
मं शर्मा (रज़ा)