अश्रु भी थे कुछ देर तलकफिर अधरों पे मुस्कान रहीरहने को घर नहीं था लेकिनह्रदय में खूब जगह रहीविचारों के उन्मुक्त गगन मेंअवरोधित उड़ान मिलीभव सागर से तरने खातिरएक स्वप्निल सुंदर नाव मिली ।मं शर्मा (रज़ा)
अश्रु भी थे कुछ देर तलकफिर अधरों पे मुस्कान रहीरहने को घर नहीं था लेकिनह्रदय में खूब जगह रही
विचारों के उन्मुक्त गगन मेंअवरोधित उड़ान मिलीभव सागर से तरने खातिरएक स्वप्निल सुंदर नाव मिली ।
मं शर्मा (रज़ा)