कभी गैरों ने दगा कीकभी अपनों की बेरूखीप्रेम की बौछारों कोतरसी जीवन की धरतीसूखे का मौसमजीवन भर चलाखुश्क हवाओं के थपेड़ेसहती रही साँसों की बस्ती ।मं शर्मा( रज़ा)
कभी गैरों ने दगा कीकभी अपनों की बेरूखीप्रेम की बौछारों कोतरसी जीवन की धरती
सूखे का मौसमजीवन भर चलाखुश्क हवाओं के थपेड़ेसहती रही साँसों की बस्ती ।
मं शर्मा( रज़ा)