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बंजरपन


उड़ा उड़ा फिरता हैआवारा सा तेरा मनबादल है बरसता जामिट जाए धरा की अगन

ये तेरी आवारगियाँये तेरा भटकता मनरूसवा कर के छोड़ेगाधरती पर फैला बंजरपन।

मं शर्मा (रज़ा)

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