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बाग बगीचे


गूँज उठे हैं स्वर कविता केज्यों बहते जल की धारा होअपनी धुन में चली जा रहीतोड़ के बंधनों का किनारा वो

कभी रचती सुंदर बाग बगीचेकभी भोर का सुंदर नजारा होकभी जीवन का मंत्र बतातीकरती निसार जीवन सारा वो।

मं शर्मा (रज़ा)

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