Poetry 1 min read 628.2K reads

बादल


न रूप है न आकार हैन घर कोई न द्वार हैमैं एक आवारा बादलभटकना मेरा स्वभाव है

गरज गरज के गुजरा कभीबिजली बन के कड़क गयावाष्प बन कर जीवन कीमैं धरती पर ही बरस गया ।

मं शर्मा( रज़ा)

Read more Earn more Learn more