संतुष्टि को आने नहीं देतारहता है विचलित सा मनसुख में भी दुख में भीरहता है सदा अतृप्त मनअपने बनाए भ्रमजाल मेंरहता है अभिशप्त सा मन ।मं शर्मा (रज़ा)
संतुष्टि को आने नहीं देतारहता है विचलित सा मनसुख में भी दुख में भीरहता है सदा अतृप्त मनअपने बनाए भ्रमजाल मेंरहता है अभिशप्त सा मन ।
मं शर्मा (रज़ा)