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आश्वासन


झूठ की चादर ओढ़ेयहाँ भूख सोई हैअभावों की भठ्ठी में आजफिर आस पकाई है

आश्वासनों के मरघट मेंसन्नाटों का शोर हैसंकेत है आज फिर किसीसमस्या ने मुक्ति पाई है।

मं शर्मा( रज़ा)

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