मुठ्ठी में है आसमान

खुल गई तो

बिखर जाएगा

लो बिखर ही गया

आसमां मेरा

सोचता हूँ

ज़मीं पर कदम

रखूँ कैसे ।


मं शर्मा (रज़ा)